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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 11
द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- रेकादशामी मनसो विकाराः । सहस्रशः शतशः कोटिशश्च क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥
ये मन की ग्यारह वृत्तियाँ द्रव्य (विषय), स्वभाव, आशय (संस्कार), कर्म और काल के द्वारा सैकड़ों, हजारों और करोड़ों भेदों में परिणत हो जाती हैं। किन्तु इनकी सत्ता क्षेत्रज् आत्मा की सत्ता से ही है, स्वत: या परस्पर मिलकर नहीं है।
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