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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 1
ब्राह्मण उवाच अकोविदः कोविदवादवादान् वदस्यथो नातिविदां वरिष्ठः । न सूरयो हि व्यवहारमेनं तत्त्वावमर्शेन सहामनन्ति ॥
जडभरत ने कहा - राजन्‌! तुम अज्ञानी होने पर भी पण्डितों के समान ऊपर-ऊपर की तर्क-वितर्कयुक्त बात कह रहे हो। इसलिये श्रेष्ठ ज्ञानियों में तुम्हारी गणना नहीं हो सकती। तत्त्वज्ञानी पुरुष इस अविचारसिद्ध स्वामी-सेवक आदि व्यवहार को तत्त्वविचार के समय सत्यरूप से स्वीकार नहीं करते।
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