एवं बह्वबद्धमपि भाषमाणं नरदेवाभिमानं
रजसा तमसानुविद्धेन मदेन तिरस्कृताशेष-
भगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान्
ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा
योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान
इव विगतस्मय इदमाह ॥
रहूगण को राजा होने का अभिमान था, इसलिये वह इसी प्रकार बहुत-सी अनाप-शनाप बातें बोल गया। वह अपने को बड़ा पण्डित समझता था, अत: रज-तमयुक्त अभिमान के वशीभूत होकर उसने भगवान् के अनन्य प्रीतिपात्र भक्तवर भरतजी का तिरस्कार कर डाला। योगेश्वरों की विचित्र कहनी-करनी का तो उसे कुछ पता ही न था। उसकी ऐसी कच्ची बुद्धि देखकर बे सम्पूर्ण प्राणियों के सुहृद् एवं आत्मा, ब्रह्मभूत ब्राह्मणदेवता मुसकराये और बिना किसी प्रकार का अभिमान किये इस प्रकार कहने लगे।
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