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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 7
अथ पुनः स्वशिबिकायां विषमगतायां प्रकुपित उवाच - रहूगणः किमिदमरे त्वं जीवन्मृतो मां कदर्थीकृत्य भर्तृशासन- मतिचरसि प्रमत्तस्य च ते करोमि चिकित्सां दण्डपाणिरिव जनताया यथा प्रकृतिं स्वां भजिष्यस इति ॥
(किन्तु) पालकी अब भी सीधी चाल से नहीं चल रही है - यह देखकर राजा रहूगण क्रोध से आग-बबूला हो गया और कहने लगा, “अरे! यह क्या? कया तू जीता ही मर गया है? तू मेरा निरादर करके (मेरी) आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है! मालूम होता है, तू सर्वथा प्रमादी है। अरे! जैसे दण्डपाणि यमराज जनसमुदाय को उसके अपराधों के लिये दण्ड देते हैं, उसी प्रकार मैं भी अभी तेरा इलाज किये देता हूँ। तब तेरे होश ठिकाने आ जायँगे"।
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