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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
सांसर्गिको दोष एव नूनमेकस्यापि सर्वेषां सांसर्गिकाणां भवितुमर्हतीति निश्चित्य निशम्य कृपणवचो राजा रहूगण उपासित- वृद्धोऽपि निसर्गेण बलात्कृत ईषदुत्थित- मन्युरविस्पष्टब्रह्मतेजसं जातवेदसमिव रजसाऽऽवृतमतिराह ॥
कहारों के ये दीन वचन सुनकर राजा रहूगण ने सोचा, "संसर्ग से उत्पन्न होने वाला दोष एक व्यक्ति में होने पर भी उससे सम्बन्ध रखने वाले सभी पुरुषों में आ सकता है। इसलिये यदि इसका प्रतीकार न किया गया तो धीरे-धीरे ये सभी कहार अपनी चाल बिगाड़ लेंगे।" ऐसा सोचकर राजा रहूगण को कुछ क्रोध हो आया यद्यपि उसने महापुरुषों का सेवन किया था तथापि क्षत्रियस्वभाववश बलातू उसकी बुद्धि रजोगुण से व्याप्त हो गयी और वह उन द्विजश्रेष्ठ से, जिनका ब्रह्मतेज भस्म से ढके हुए अग्नि के समान प्रकट नहीं था, इस प्रकार व्यंग्य भरे वचन कहने लगा।
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