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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 24
तन्मे भवान् नरदेवाभिमानमदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य । कृषीष्ट मैत्री दृशमार्तबन्धो यथा तरे सदवध्यानमंहः ॥
दीनबन्धो! राजत्व के अभिमान से उन्मत्त होकर मैंने आप-जैसे परम साधु की अवज्ञा की है। अब आप ऐसी कृपादृष्टि कीजिये, जिससे इस साधु-अवज्ञारूप अपराध से मैं मुक्त हो जाऊँ।
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