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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 23
शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानां यः किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम् । स्वधर्ममाराधनमच्युतस्य यदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥
आपने जो दण्डादि की व्यर्थता बतायी, सो राजा तो प्रजा का शासन और पालन करने के लिये नियुक्त किया हुआ उसका दास ही है। उसका उन्मत्तादि को दण्ड देना पिसे हुए को पीसने के समान व्यर्थ नहीं हो सकता; क्‍योंकि अपने धर्म का आचरण करना भगवान्‌ की सेवा ही है, उसे करने वाला व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण पापराशि को नष्ट कर देता है।
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