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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 22
स्थाल्यग्नितापात्पयसोऽभिताप- स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धिः । देहेन्द्रियास्वाशयसन्निकर्षा- त्तत्संसृतिः पुरुषस्यानुरोधात् ॥
(देहादि के धर्मो का आत्मापर कोई प्रभाव ही नहीं होता, ऐसी बात भी नहीं है) चूल्हे पर रखी हुई बटलोई जब अग्नि से तपने लगती है, तब उसका जल भी खौलने लगता है और फिर उस जल से चावल का भीतरी भाग भी पक जाता है। इसी प्रकार अपनी उपाधि के धर्मों का अनुवर्तन करने के कारण देह, इन्द्रिय, प्राण और मन की सन्निधि से आत्मा को भी उनके धर्म श्रमादि का अनुभव होता ही है।
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