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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 20
स वै भवाँल्लोकनिरीक्षणार्थ- मव्यक्तलिङ्गो विचरत्यपि स्वित् । योगेश्वराणां गतिमन्धबुद्धिः कथं विचक्षीत गृहानुबन्धः ॥
क्या आप वे कपिलमुनि ही हैं, जो लोकों की दशा देखने के लिये इस प्रकार अपना रूप छिपाकर विचर रहे हैं? भला, घर में आसक्त रहने वाला विवेकहीन पुरुष योगेश्वरों की गति कैसे जान सकता है?
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