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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 18
तद्ब्रूह्यसङ्गो जडवन्निगूढ- विज्ञानवीर्यो विचरस्यपारः । वचांसि योगग्रथितानि साधो न नः क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम् ॥
अतः कृपया बतलाइये, इस प्रकार अपने विज्ञान और शक्ति को छिपाकर मूर्खो की भाँति विचरने वाले आप कौन हैं? विषयों से तो आप सर्वथा अनासक्त जान पड़ते हैं। मुझ आपकी कोई थाह नहीं मिल रही है। हे साधो! आपके योगयुक्त वाक्यों की बुद्धि द्वारा आलोचना करने पर भी मेरा सन्देह दूर नहीं होता।
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