परीक्षित्! सिन्धु-सौवीरनरेश रहूगण भी अपनी उत्तम श्रद्धा के कारण तत्त्वजिज्ञासा का पूरा अधिकारी था। जब उसने उन द्विजश्रेष्ठ के अनेकों योग-ग्रन्थों से समर्थित और हृदय की ग्रन्थि का छेदन करने वाले ये वाक्य सुने, तब वह तत्काल पालकी से उतर पड़ा। उसका राजमद सर्वथा दूर हो गया और वह उनके चरणों में सिर रखकर अपना अपराध क्षमा कराते हुए इस प्रकार कहने लगा।
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