श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! मुनिवर जडभरत यथार्थ तत्त्व का उपदेश करते हुए इतना उत्तर देकर मौन हो गये। उनका देहात्मबुद्धि का हेतुभूत अज्ञान निवृत्त हो चुका था, इसलिये वे परम शान्त हो गये थे। अत: इतना कहकर भोग द्वारा प्रारब्धक्षय करने के लिये वे फिर पहले के ही समान उस पालकी को कन्धे पर लेकर चलने लगे।
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