उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां
गतस्य मे वीर चिकित्सितेन ।
अर्थः कियान् भवता शिक्षितेन
स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेषः ॥
वीरवर! मैं मत्त, उन्मत्त और जड के समान अपनी ही स्थिति में रहता हूँ। मेरा इलाज करके तुम्हें क्या हाथ लगेगा? यदि मैं वास्तव में जड और प्रमादी ही हूँ तो भी मुझे शिक्षा देना पिसे हुए को पीसने के समान व्यर्थ ही होगा।
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