“तुम राजा हो और मैं प्रजा हूँ” इस प्रकार की भेदबुद्धि के लिये मुझे व्यवहार के सिवा और कहीं तनिक भी अवकाश नहीं दिखायी देता। परमार्थदृष्टि से देखा जाय तो किसे स्वामी कहें और किसे सेवक? फिर भी राजन्! तुम्हें यदि स्वामित्व का अभिमान है तो कहो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ?
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