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परमहंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 10
स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च । निद्रा रतिर्मन्युरहं मदः शुचो देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥
स्थूलता, कृशता, आधि, व्याधि, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, निद्रा, प्रेम, क्रोध, अभिमान और शोक - ये सब धर्म देहाभिमान को लेकर उत्पन्न होने वाले जीव में रहते हैं; मुझमें इनका लेश भी नहीं है।
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