इदं यज्ञोपवीतं तु परमं यत्परायणम्। विद्वान्यज्ञोपवीती संधारयेद्यः स मुक्तिभाक् ॥
जो विद्वान् इस परम तत्त्व रूपी और ब्रह्मपरायण यज्ञोपवीत को धारण करता है, वही सच्चा यज्ञोपवीती और मुक्ति का अधिकारी है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
परब्रह्म के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
परब्रह्म के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।