प्रारब्धकर्मपर्यन्तमहिनिर्मोकवद्वयवहरति । चन्द्रवच्चरते देही स मुक्तश्चानिकेतनः ।।
प्रारब्ध कर्मों के क्षय होने तक जीव, सर्प के केंचुल बदलते रहने की तरह अन्य शरीर धारण करता रहता है; किन्तु अनिकेतन (एक ग्राम में एक रात्रि ही निवास करने वाला परिव्राजक) और मुक्त पुरुष आकाश में चन्द्रमा के समान सर्वत्र सञ्चरित होता रहता है।
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