य एतदुपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति । स वायुपूतो भवति । स आदित्यपूतो भवति । स ब्रह्मपूतो भवति । स विष्णुपूतो भवति । स रुद्रपूतो भवति । स सर्वेषु तीर्थेषु स्न्नातो भवति । स सर्वेषु वेदेष्वधीतो भवति । स सर्ववेदव्रतचर्यासू चरितो भवति । तेनेतिहासपुराणानां रुद्राणां शतसहस्त्राणि जप्तानि फलानि भवन्ति। प्रणवानामयुतं जप्तं भवति । दश पूर्वान्दशोत्त-रान्पुनाति । स पङ्क्तिपावनो भवति । स महान्भवति। ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयगुरु-तल्पगमनतत्संयोगिपातकेभ्यः पूतो भवति ॥
जो इस उपनिषद् का नित्य पाठ करता है (अध्ययन करता है), वह अग्नि के समान, वायु के समान, आदित्य के समान, ब्रह्म के समान, विष्णु के समान और रूद्र के समान पवित्र होता है। वह समस्त तीर्थों में स्नान किए हुए के समान होता है, समस्त वेदों का ज्ञाता होता है, समस्त वेदों में वर्णित व्रतों का पालन करने चाला होता है। उसे इतिहास-पुराण आदि के अध्ययन तथा एक लक्ष रुद्रमन्त्र के जप का फल प्राप्त होता है। उसे दस सहल ‘प्रणव’ नाम के जप का फल मिलता है। उसके पूर्व की दस और बाद की दस पीढ़ियों पवित्र हो जाती हैं। वह साथ में बैठने वालों को पवित्र करता है, जिसके कारण ‘पंक्ति पावन’ हो जाता है। वह महान् होता है। वह ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरुपत्नी-गमन तथा ऐसे महापातक करने वालों की संगति से उत्पन्न पातकों से मुक्त (पवित्र) हो जाता है।
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