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पैंगल • अध्याय 4 • श्लोक 26
ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते । मनसो ह्यन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥
मेरा है, यह भाव बन्धन में डालता है और मेरा नहीं है, यह भाव मोक्ष प्रदान करता है। जब मन उन्मनी अवस्था (भाव) को प्राप्त हो जाता है, तब द्वैत भाव समाप्त हो जाता है।
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