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पैंगल • अध्याय 4 • श्लोक 14
हृदयं निर्मलं कृत्वा चिन्तयित्वाप्यनामयम्। अहमेव परं सर्वमिति पश्येत्परं सुखम् ॥
हृदय को निर्मल करके और अपने को ‘मैं अनामय ब्रह्म हैं’, ऐसा चिन्तन करके मैं ही सब कुछ हूँ, ऐसा सोचने व देखने से परम सुख प्राप्त होता है।
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