दग्धस्य दहनं नास्ति पक्वस्य पचनं यथा । ज्ञानाग्निदग्धदेहस्य न च श्राद्धं न च क्रिया ॥
जिस प्रकार जले हुए को जलाया नहीं जाता और पके हुए को पुनः पकाया नहीं जाता, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि से दग्ध (संन्यासी) के लिए न कोई श्राद्ध आवश्यक है और न ही कोई क्रिया-कर्म।
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