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पैंगल • अध्याय 2 • श्लोक 3
अथापञ्चीकृतमहाभूतरजोंशभागत्रयसमष्टितः प्राणमसृजत्। प्राणापानव्यानोदान-समानाः प्राणवृत्तयः । नागकुर्मकृकरदेवदत्तधनंजया उपप्राणाः ।हृदासननाभिकण्ठसर्वाङ्गानि स्थानानि । आकाशादिरजोगुणतुरीयभागेन कर्मेन्द्रियमसृजत् । वाक्पाणिपादपायूप-स्थास्तद्वृत्तयः । वचनादानगमनविसर्गानन्दास्तद्विषयाः। एवं भूतसत्त्वांशभागत्रयसमष्टि-तोऽन्तःकरणमसृजत् । अन्त:करणमनोबुद्धिचित्ताहंकारास्तद्वृत्तयः। संकल्पनियस्म-रणाभिमानानुसंधानास्तद्विषयाः। गलवदननाभिहृदयभ्रूमध्यं स्थानम्। भूतसत्त्वतुरीयभागेन ज्ञानेन्द्रियमसृजत्। श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणास्तद्वृत्तयः। शब्दस्पर्शरूपरसगन्धास्तद्विषयाः। दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युकाः। चन्द्रो विष्णुश्चतुर्वक्त्रः शंभुश्च करणाधिपाः ॥
इसके पश्चात् अपञ्चीकृत महाभूतों के रजोगुण युक्त अंश के तीन भागों को समन्वित करके प्राण का सृजन किया गया। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान ये पाँच प्राण हैं। इसी प्रकार नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त और धनंजय ये पाँच उपप्राण हैं। हृदय, आसन (मूलाधार), नाभि, कण्ठ और सर्वाङ्ग उस (प्राण) के स्थान हैं। आकाश आदि पञ्चमहाभूतों के रजोगुणयुक्त अंश के चतुर्थ भाग से कर्मेन्द्रियों का सृजन किया गया। वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ (शिश्न) इसके प्रकार हैं। वचन, आदान, गमन, विसर्जन और आनन्द ये इन (कर्मेन्द्रियों) के विषय हैं। इस प्रकार पञ्चमहाभूतों के सत्व अंश के तीन भागों से अन्त:करण का सृजन किया। अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और उनकी वृत्तियाँ समाहित हैं। संकल्प, निश्चय, स्मरण, अभिमान तथा अनुसन्धान क्रमशः इनके विषय हैं। गला, मुख, नाभि, हृदय और भौंहों के मध्य का भाग इनके स्थान हैं। महाभूतों के सत्त्व अंश के चतुर्थ भाग से ज्ञानेन्द्रियों का सृजन किया गया। श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और घ्राण ये इनके (ज्ञानेन्द्रियों के) प्रकार हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इनके विषय हैं। दिशाएँ, वायु, अर्क (सूर्य), वरुण, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र मृत्यु के देवता यम, चन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और शिव ये सभी देवगण इन इन्द्रियों के स्वामी हैं।
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