अविचार करने से बन्धन और विचार (सदविचार) करने से मोक्ष होता है। इसलिए सदैव विचार (सविचार) करना चाहिए। अध्यारोप और अपवाद से स्वरूप का निश्चय किया जा सकता है। इसलिए सदा जगत्, जीव और परमात्मा के विषय में ही विचार (चिन्तन) करना चाहिए। जीव भाव और जगद्भाव का निराकरण करने से अपने प्रत्यगात्मा (जौव) से अभिन्न केवल ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है।
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