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पैंगल • अध्याय 1 • श्लोक 11
अण्डस्थानि तानि तेन विना स्पन्दितुं चेष्टितुं वा न शेकुः । तानि चेतनीकर्तुं सोऽकामयत ब्रह्माण्डब्रह्मरन्ध्राणि समस्तव्यष्टिमस्तकान्विदार्य तदेवानुप्राविशत् । तदा जडान्यपि तानि चेतनवत्स्वकर्माणि चक्रिरे॥
ब्रह्माण्ड में स्थित वे देवगण उस (ब्रह्म) के बिना न तो स्पन्दन कर सके और न ही कोई चेष्टा कर सके। तब उस (ब्रह्म) ने उन्हें चैतन्य करने की इच्छा की। वह ब्रह्माण्ड, ब्रह्मरन्ध्र और समस्त व्यष्टि के मस्तक को विदीर्ण करके उसी में प्रवेश कर गया, तब वे जड़ता सम्पन्न होते हुए भी चेतन की तरह अपने-अपने कर्म में प्रवृत्त हो गये।
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