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पंचब्रह्म • अध्याय 1 • श्लोक 9
ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम् । आकाशात्मकमव्यक्तंमोंकारस्वरभूषितम् ॥ सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्वहिः । अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम् ॥ पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत् ॥ पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः । स्वमायावैभवान्सर्वान्संहत्य स्वात्मनि स्थितः ॥ पञ्चब्रह्मात्म कातीतो भासते स्वस्वतेजसा। आदावन्ते च मध्ये च भासते नान्यहेतुना ॥
'ईशान' को परमात्मतत्त्व के रूप में प्रेरणा प्रदान करने वाला जानना चाहिए। (वे) बुद्धि के साक्षीरूप, आकाश स्वरूप (सर्वत्र व्यापक), अव्यक्त एवं ॐकार के स्वर से (ध्वनि से) विभूषित हैं। वे समस्त देवों के स्वरूप वाले, शान्त, शान्ति से भी परे अर्थात् अत्यन्त शान्ति से सम्पन्न, स्वरों से परे (अर्थात् स्वरों से जिनका ज्ञान सम्भव नहीं), 'अकार' आदि स्वरों के जो अधिष्ठाता स्वरूप हैं तथा जो आकाशमय (व्यापक) शरीर से युक्त हैं। (वे) सृष्टि आदि पाँच (सृष्टि, स्थिति, ध्वंस, विधान और अनुग्रह) कृत्यों के नियन्ता एवं सर्वव्यापक विराट् पंच ब्रह्मस्वरूप हैं। वे (ईशान) पंचब्रह्म का उपसंहार (निर्वाण) करके अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होकर अपनी माया के वैभव-प्रभाव से सबका संहार करके अपनी ही आत्मा में प्रतिष्ठित रहने वाले हैं। वे (ईशान) पंच ब्रह्म से परे रहकर स्वयं अपने ही तेज से प्रकाशित हैं और आदि, मध्य एवं अन्त में भी किसी अन्य कारण से भासित नहीं होते, वरन् (वह) स्वयं प्रकाश स्वरूप एवं स्वयम्भू हैं।
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