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पंचब्रह्म • अध्याय 1 • श्लोक 7
वामदेवं महाबोधदायकं पावकात्मकम् । विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम् ॥ प्रसन्नं सामवेदाख्यं गानाष्टकसमन्वितम्। धीरस्वरमधीनं चाहवनीयमनुत्तमम् ॥ ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम्। वर्णं शुक्लं तमोमिश्र पूर्णबोधकरं स्वयम् ॥ धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम्। सर्वसौभाग्यदं नृणां सर्वकर्मफलप्रदम् ॥ अष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम् ॥
'वामदेव' महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं। अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्रिसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है। वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आंदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट,त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्त्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं।
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