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पंचब्रह्म • अध्याय 1 • श्लोक 5
गोप्यागोप्यतरं लोके यद्यस्ति शृणु शाकल। सद्योजातं मही पूषा रमा ब्रह्मा त्रिवृत्स्वरः ॥ ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्त स्वरास्तथा। वर्णं पीतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥
हे शाकल! इस लोक में अति गोपनीय बातों में भी जो अति गूढ़ है, उसे सुनो। वह है 'सद्योजात' नामक ब्रह्म। सभी तरह की अभीष्ट सिद्धियों को देने वाली मही, पूषा, रमा, ब्रह्मा, त्रिवृत् (सत्, रज, तम), अकारादि स्वर, त्र्ऋग्वेद, गार्हपत्य (अग्रि), विविध मंत्र (नमः शिवाय आदि) सात स्वर (स.रे.ग.म.प.ध.नि), पीला वर्ण (रंग) तथा क्रिया नामक शक्ति आदि जिसके अनेक स्वरूप हैं।
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