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पंचब्रह्म • अध्याय 1 • श्लोक 17
अस्मिन्ब्रह्मपुरे वेश्म दहरं यदिदं मुने। पुण्डरीकं तु तन्मध्ये आकाशो दहरोऽस्ति तत् । स शिवः सच्चिदानन्दः सोऽन्वेष्टव्यो मुमुक्षुभिः ॥ अयं हृदि स्थितः साक्षी सर्वेषामविशेषतः । तेनायं हृदयं प्रोक्तः शिवः संसारमोचकः । इत्युपनिषत् ॥ ॐ सह नाववतु ... ... ... इति शान्तिः ॥ ॥ इति पञ्चब्रह्मोपनिषत्समाप्ता ॥
हे मुने! इस अविनाशी ब्रह्म के आश्रयस्थल शरीर में जो दहर नामक निवास स्थल (हृदय में) है, जिसे पुण्डरीक (कमल) भी कहते हैं, उसी में दहराकाश स्थित है। उसी में ही मोक्ष के इच्छुक साधकों को सत्-चित् एवं आनन्दस्वरूप उस शिव को ढूँढ़ना चाहिए। यह शिवं सदैव हृदय कमल में ही प्रतिष्ठित रहता है एवं निर्विशेष (सामान्य) दृष्टि से सभी का साक्षीभूत है। इस कारण से हृदय को शिवस्वरूप कहकर इस (हृदय) को ही संसार का मोचक अर्थात् संसार से मुक्त करने वाला कहा गया है।
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