तद्रूपेण सदा सत्यं भेदेनोक्तिर्मषा खलु। तच्च कारणमेकं हि न भिन्नं नोभयात्मकम् ॥ भेदः सर्वत्र मिथ्यैव धर्मादेरनिरूपणात्। अतश्च कारणं नित्यमेकमेवाद्वयं खलु। अत्र कारणमद्वैतं शुद्धचैतन्यमेव हि ॥
यदि किसी भी वस्तु को (कार्य को) तद्रूप अर्थात् कारण के अनुरूप मान लिया जाए, तो वह सदा सत्य है। जब उसे भिन्न (तद्रूप से भिन्न) कहेंगे, तो वह मिथ्या कथन होगा; क्योंकि सभी कार्यों का कारण तो एक ही है। वह न तो भिन्न है और न ही उभयात्मक है। यह जो सभी जगहों पर भेद की प्रतीति होती है, उसका कारण धर्म के निरूपण का अभाव ही है। अतः कारण तो वस्तुतः एक ही है, वह दूसरा (भिन्न) नहीं है। इसलिए इस चराचर विश्व का कारण शुद्ध चैतन्यरूप अद्वैत ही है।
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