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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 98
वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणात् मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते। व्यालो माल्यगुणायते विषरसः पीयूष वर्षायते यस्याङ्गेऽखिललोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति।।
जिस पुरुष में समस्त जग को मोहने वाला शील है उसके लिए अग्नि जल सी जान पड़ती है; समुद्र छोटी नदी सा दीखता है, सुमेरु पर्वत छोटी सी शिला सा मालूम होता है, सिंह शीघ्र उसके आगे हिरन सा हो जाता है, सर्प उसके लिए फूलों की माला सा बन जाता है और विष अमृत के गुणों वाला हो जाता है।
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