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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 95
कदर्थितस्यापि हि धैर्यवृत्तेर्न शक्यते धैर्यगुणः प्रमार्ष्टुम्। अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्नेर्नाधः खिखा याति कदाचिदेव ।।
धैर्यवान पुरुष घोर दुख पड़ने पर भी अपने धैर्य को नहीं छोड़ता; क्योंकि प्रज्वलित अग्नि के उल्टा कर देने पर भी उसकी शिखा ऊपर ही को रहती है।
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