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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 92
भीम वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं सर्वो जनः सुजनतामुपयातितस्य । कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य।।
जिस मनुष्य के पूर्व जन्म के उत्तम कर्म – पुण्य – अधिक होते हैं, उनके लिए भयानक वन, नगर हो जाता है। सभी मनुष्य उसके हितचिंतक मित्र हो जाते हैं और सारी पृथ्वी उसके लिए रत्नपूर्ण हो जाती है।
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