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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 91
मज्जत्वंभसि यातु मेरुशिखर शत्रुञ्जय त्वाहवे वाणिज्यं कृषिसेवनादिसकला विद्याः कलाः शिक्षतु । आकाशं विपुलं प्रयातु खगवत्कृत्वा प्रयत्नं परं नो भाव्यं भवतीह कर्मवशतो भव्यस्य नाशः कुतः ।।
चाहे समुद्र में गोते लगाओ; चाहे सुमेरु के सिर पर चढ़ जाओ; चाहे घोर युद्ध में शत्रुओं को जीतो; चाहे खेती, वाणिज्य-व्यापार और अन्यान्य सारी विद्या और कलाओं को सीखो; चाहे बड़े प्रयत्न से पखेरुओं की तरह आकाश में उड़ते फिरो; परन्तु प्रारब्ध के वश से अनहोनी नहीं होती और होनहार नहीं टलती।
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