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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 90
स्थाल्यां वैदूर्मय्यां पचति च लशुनं चान्दनैरीन्धनोघैःसौवर्णेर्लाङ्गलाग्रैविलिखति वसुधामर्कमूलस्य हेतोः । छित्त्वा कर्पूर खण्डानवृतिमिह कुरुते कोद्रवाणाम् समन्तात्प्राप्येमां कर्मभूमि न चरति मनुजो यस्तपो मद्भाग्यः ।।
जो मन्दभागी, इस कर्मभूमि – संसार – में आकर तप नहीं करता, वह निस्संदेह उस मूर्ख की तरह है, जो लहसन को मरकतमणि के वासन में चन्दन के ईंधन से पकाता है; अथवा खेत में सोने का हल जोतकर आक की जड़ प्राप्त करना चाहता है अथवा कोदों के खेत के चारों तरफ कपूर के वृक्षों को काटकर उनकी बाढ़ लगाता है।
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