वन में, रण में, शत्रुओं में, आग में, समुद्र अथवा पर्वत की चोटी पर सोते हुए, आफत में पड़े हुए मनुष्य की रक्षा, पूर्व जन्म के पुण्य कर्म ही करते हैं।
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