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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 87
वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे पर्वतमस्तके वा। सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा रक्षन्ति पुण्यानि पुराकृतानि ।।
वन में, रण में, शत्रुओं में, आग में, समुद्र अथवा पर्वत की चोटी पर सोते हुए, आफत में पड़े हुए मनुष्य की रक्षा, पूर्व जन्म के पुण्य कर्म ही करते हैं।
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