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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 84
कर्म प्रशंसानमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगा ।विधिर्वन्द्यः सोऽपि प्रतिनियतकर्मैकफलदः ।। फलं कर्मायत्तं किमरगणैः किं च विधिना ।नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ।।
देवताओं की हम सब वन्दना करते हैं, पर वे सब विधाता के अधीन दीखते हैं, इसलिए हम विधाता की वन्दना करते हैं, पर विधाता भी हमारे पूर्व जन्म के कर्मो के हिसाब से ही फल देता है। जब फल और विधाता, दोनों ही कर्म के वश में हैं, तब देवताओं और विधाता से क्या मतलब? कर्म ही सर्वोपरि है; इसलिए हम कर्म को नमस्कार करते हैं, जिसके खिलाफ विधाता भी कुछ नहीं कर सकता।
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