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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 83
पत्रं नैव यदा करीर विटपे दोषो वसन्तस्य किंनोलुकोऽप्यव्लोकते यदि दिवा सूरस्य किं दूषणम् । धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तत् मार्जितुः कः क्षमः ।।
अगर करील के पेड़ में पत्ते नहीं लगते तो इसमें बसंत का क्या दोष है? अगर उल्लू को दिन में नहीं सूझता, तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? अगर पापहीये के मुख में जल-धारा नहीं गिरती, तो इसमें मेघ का क्या दोष है? विधाता ने जो कुछ भाग्य में लिख दिया है, उसे कोई भी मिटा नहीं सकता।
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