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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 82
सृजति तावदशेपगुणाकरं पुरुषरत्नमलंकरणं भुवः । तदपि तत्क्षणभंगिकरोति चेदहह कष्टमपण्डितताविधे: ।।
बड़े दुख कि बात है, कि विधाता सब गुणों की खान और पृथ्वी के भूषण पुरुषरत्न को सृजन कर भी, उसकी देह को क्षण-भंगुर कर देता है। इसी से विधाता की मूर्खता ही प्रकट होती है।
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