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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 80
खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैःसन्तापितो मस्तके ।गच्छन्देशमनातपं विधिशात्तालस्य मूलं गतः ।। तत्राप्यस्य महाफ़लेन पतता भग्नं सशब्दं शिरः ।प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तत्रैव यान्त्यापदः ।।
किसी गंजे आदमी का सर धुप से जलने लगा । वह छाया की इच्छा से, दैवात एक ताड़ के वृक्ष के नीचे जाके खड़ा हो गया। उसके वह पहुँचते ही, एक बड़ा ताड़-फल उसके सर पर बड़े जोर से गिरा। उससे उसकी खोपड़ी फट गयी। इससे सिद्ध होता है, कि भाग्यहीन मनुष्य जहाँ जाता है, उसकी विपत्ति भी प्रायः उसके साथ साथ जाती है।
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