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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 77
छिन्नोऽपिरोहत तरुः क्षीणोऽप्युपचीयते पुनश्चन्द्रः। इति विमृशन्तः सन्तः सन्तप्यन्ते न विप्लुता लोके ।।
कटा हुआ वृक्ष फिर चढ़ कर फैल जाता है, क्षीण हुआ चन्द्रमा भी फिर धीरे धीरे बढ़ कर पूरा हो जाता है, इस बात को समझ कर, संतपुरुष अपनी विपत्ति में नहीं घबराते।
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