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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 76
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमो बंधुर्यं कृत्वा नावसीदति ।।
आलस्य मनुष्यों के शरीर में रहने वाला घोर शत्रु है और उद्योग के सामान उनका कोई बन्धु नहीं है; क्योंकि उद्योग करने वाले मनुष्य के पास दुख नहीं आते।
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