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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 75
पतितोऽपि कराघातैरुत्पततत्येव कन्दुकः। प्रायेण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः।।
जिस तरह हाथ से गिराने पर भी गेंद ऊँची ही उठती है, उसी तरह साधु वृत्ति पर चलने वालों की विपत्ति भी सदा नहीं रहती।
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