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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 74
भग्नाशस्य करण्डपीडितंतेनोर्म्लानेन्द्रियस्य क्षुधा । कृत्वा खुर्विवरं स्वयं निपतितो नक्तं मुख्य भोगिनः ।। तप्तस्तत्पिशितेन सत्वरमसौ तेनैव थातः पथा । लोकाःपश्यत दैवमेव हि नृणां वृद्धौ क्षये कारणं ।।
एक सर्प पिटारी में बन्द पड़ा हुआ, जीवन से निराश, शरीर से शिथिल और भूख से व्याकुल हो रहा था । उस समय एक चूहा रात के वक्त, कुछ खाने की चीज़ पाने की आशा से, पिटारे में छेद करके घुसा और सर्प के मुंह में गिरा। सर्प उसे खाकर तृप्त हो गया और उसी चूहे के किये हुए छेद की राह से बाहर निकल कर स्वतंत्र – आज़ाद हो गया। इस घटना को देखकर , मनुष्यों को अपनी वृद्धि और क्षय का एकमात्र कारण दैव को ही समझना चाहिए।
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