मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 70
रत्नैर्महार्हैस्तुपुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् । सुधां विना न प्रपयुरविरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः ।।
समुद्र मथते समय, देवता नाना प्रकार के अमोल रत्न पाकर भी संतुष्ट न हुए – उन्होंने समुद्र मथना न छोड़ा। भयानक विष से भयभीत होकर भी, उन्होंने अपना उद्योग न त्यागा । जब तक अमृत न निकल आया उन्होंने विश्राम न किया – अविरत परिश्रम करते ही रहे। इससे यह सिद्ध होता है, कि वीर पुरुष अपने निश्चित अर्थ – इच्छित पदार्थ – को पाए बिना, बीच में घबरा कर अपना काम नहीं छोड़ बैठते।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
नीति शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

नीति शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें