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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 67
यः प्रणीयेत्सुचरितै पितरं स पुत्रो । यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।। तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं य- देतत्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ।।
अपने उत्तम चरित्र से पिता को प्रसन्न रखे वही पुत्र है, अपने पति का सदा-सर्वदा भला चाहे वही स्त्री है और सम्पद और विपद – दोनों अवस्थाओं में एक सा रहे वही मित्र है। जगत में ये तीनो भाग्यवानो को ही मिलते हैं।
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