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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 66
सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते । मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते ।। स्वात्यां सागरशुक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते । प्रायेणोत्तममध्यमाधमदशा संसर्गतो देहिनाम् ।।
गर्म लोहे पर जल की बूँद पड़ने से उसका नाम भी नहीं रहता; वही जल की बूँद कमल के पत्ते पर पड़ने से मोती सी हो जाती है और वही जल की बूँद स्वाति नक्षत्र में समुद्र की सीप में पड़ने से मोती हो जाती है। इससे सिद्ध होता है, कि संसार में अधम, मध्यम और उत्तम गुण प्रायः संसर्ग से ही होते हैं।
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