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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 65
संपत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलं । आपत्सु च महाशैलशिलासंघातकर्कशम् ।।
सम्पत्तिकाल में महापुरुषों का चित्त, कोमल से भी कोमल रहता है और विपद काल में पर्वत की महँ शिला की तरह कठोर हो जाता है।
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