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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 63
प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः। प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृतेः ।। अनुत्सेको लक्ष्म्यां निरभिभवसारा परकथाः । सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ।।
दान को गुप्त रखना, घर आये का सत्कार करना, पराया भला करके चुप रहना, दूसरों के उपकार को सबके सामने कहना, धनी होकर गर्व न करना और पराई बात निन्दा-रहित कहना – ये गुण महात्माओं में स्वाभाव से ही होते हैं।
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