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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 60
मॄगमीनसज्जनानं तृणजलसन्तोपविहितवृत्तिनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ।।
हिरन, मछली और सज्जन क्रमशः तिनके, जल और सन्तोष पर अपना जीवन निर्वाह करते हैं; पर शिकारी, मछुए और दुष्ट लोग अकारण ही इनसे वैर भाव रखते हैं।
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