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नीति शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 57
मानौंन्मूकः प्रवचनपटुः वाचको जल्पको वा धृष्टः पार्श्वे वसति च तथा दूरतश्चाप्रगल्भः । क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजात: सेवाधर्म परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ।।
नौकर यदि चुप रहता है तो मालिक उसे गूंगा कहता है; यदि बोलता है तो उसे बकवादी कहता है; यदि पास रहता है तो ढीठ कहता है; यदि खरी-खोटी सुन लेता है तो डरपोक कहता है और यदि नहीं सहता है तो उसे नीच कुल का कहता है। मतलब यह है कि सेवा धर्म – पराई चाकरी बड़ी ही कठिन है; योगियों के लिए भी अगम्य है।
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